जीवन
के संक्षिप्त परिमंडल में चरित्र निर्माण को प्राथमिकता मिले यही हमारा ध्येय भी होना
चाहिए; जब सृष्टि का नियंत्रण मनुष्य के हाथ में है ही नहीं तो फिर उस व्यवस्था के
साथ खेलने का अधिकार भी न रहे; उस व्यवस्था
के साथ सामंजस्य रखते हुए ही चलना होगा, न कि काल की गति के विपरीत।
इस
विज्ञान को समझना इतना भी कठिन नहीं कि इसे और सरल करने के लिए बड़े बड़े व्याख्यान रचे
जाएँ; बल्कि इसे समझ लेने के बाद मनुष्य को अपने जीवन के रहते रहते उस जीवन का मुख्य
ध्येय ही समझ लेना होगा, एक भूमिका बनाने के लिए तैयार भी होना होगा; उसके मुताबिक़
आचरण भी बनाना होगा; कालचक्र के साथ तालमेल रखते हुए उस संतुलन को भी बनाये रखने का
प्रयास करना होगा जिसकी समझ बानी होगी; मनुष्य कहीं भी रहे, कुछ भी कर्म करे, इस मनुष्य
संकुल से अलग हो ही नहीं सकता; अतः जितने भी विविध प्रकार के भेद बुद्धि का निर्माण
हुआ होगा उसका सम्यकत्व भी विज्ञान सम्मत नहीं लगता। जागतिक संकट की स्थिति आ जानेपर सबको संघबद्ध होना
ही होगा।
प्रश्न
यह निर्माण हो जाता है कि हर समुदाय में इस तत्व को समझनेवालों की एक संख्या तो है,
फिर लोग अपनी भूमिका सही समय पर बाँध नहीं पाते इसका कोई ठोस कारण तो जरूर कुछ न कुछ
होगा ही। उन कारणों का अनुसंधान करते हुए जागतिक
मैत्री के लिए वातावरण निर्माण करना ही एक प्रबुद्ध नागरिक का कर्तव्य माना जाएगा;
सिर्फ मिल बैठकर बड़े बड़े व्याख्यान देने के
निमित्त से और अपनी पीठ थपथपा लेने से कुछ विशेष ध्येय की प्राप्ति हो ही नहीं सकती।
